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मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां लिरिक्स !! रामदेव जी भजन लिरिक्स !! ramdvji bhajan lyrics !!

 

मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां – रामदेव जी भजन



भजन : मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां

मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां, मने घोड़लियों मंगवाय।

घोड़ों चढ़कर घुमन जास्यूँ, घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां, मने घोड़लियों मंगवाय। 

बालपने में रामदेवजी हठ किन्यों है भारी।

कैसो हठ किन्यों रे बालक, सोच रही महतारी।
कीकर इने में समझाऊं, लाग रही मन में चिंता।

 मीणा दे सुगना रे खातिर, दर्जी ने बुलवायो।

रामदेव रे खातिर घोड़ों, कपड़े रो बनवायो।
दर्जी मन में लालच किनो, भीतर बहुत भरया भरमा।

रंग रंगीलो नेणुओ घोड़ो, बालक रे मन भायो।

लिंही हाथ लगाम बापजी, मन ही मन मुसकायो।
एड़ी लगाई घोड़लिए के, रामदेव आकाश हुया।

 जादू रो घोड़ालियों म्हारो, दर्जी गढ़ने लायो।

माता-पिता मन में घबराया, दर्जी कैद करायो।
दर्जी विनती करबा लाग्यो, रामदेवजी कष्ट हरया।

 दर्जी ने पर्चो दिखलायो, रामदेव अवतारी।

दास भगत सुनावे थाने, अर्जी सुनो हमारी।
हिवड़े में संतोष विराजे, रुणिचे रा धणिया।
 


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भावार्थ / सारांश

यह सुंदर और भावमय भजन "मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां" राजस्थान के लोकदेवता श्री रामदेवजी की बाल लीलाओं को उजागर करता है। इस भजन में बालक रामदेव की सहज दिव्यता, उनकी बालमन की जिद, माता-पिता की चिंता, और एक दर्जी की परीक्षा एवं भक्ति का अनूठा चित्रण है। भजन की हर पंक्ति हमें रामदेवजी की अवतारी महिमा और चमत्कारी शक्ति से परिचित कराती है।

1. रामदेवजी का बचपन और उनका हठ

भजन की शुरुआत होती है रामदेवजी के बचपन के एक प्रसंग से, जहाँ वे अपनी माँ से घोड़े (घोड़लियाँ) मँगवाने का हठ करते हैं। यह कोई साधारण बालक का जिद्दीपन नहीं था, बल्कि यह एक दैवी इच्छा थी। माँ यह देखकर चिंतित होती है कि बालक ऐसा जिद क्यों कर रहा है — “कैसो हठ किन्यो रे बालक, सोच रही महतारी”।

यह प्रसंग यह संकेत देता है कि रामदेवजी बचपन से ही विलक्षण और ईश्वरीय गुणों से संपन्न थे। उनकी माँ उन्हें समझाने का प्रयास करती है, लेकिन बालक रामदेव अपनी बात पर अटल रहते हैं।

यह यहाँ दर्शाता है कि ईश्वर जब अवतार लेता है, तो बचपन में भी उसकी लीलाएँ साधारण नहीं होतीं।

2. दर्जी की परीक्षा और कपड़ों की तैयारी

रामदेवजी की इच्छानुसार, माता-पिता एक दर्जी को बुलाते हैं जो घोड़ों के लिए सुंदर और रंग-बिरंगे वस्त्र तैयार करता है। लेकिन दर्जी के मन में लालच और संशय उत्पन्न होता है — क्या यह घोड़े सच में चलेंगे? क्या यह सब एक बालक की कल्पना मात्र है?

दर्जी कपड़े तो बना देता है लेकिन भीतर ही भीतर उसे यह सब एक खेल या छलावा लगता है। यह मनुष्य की स्वाभाविक शंका को दर्शाता है — जब कोई चमत्कारिक बात होती है तो साधारण जनमानस उसे झूठ या भ्रम मान लेता है।

3. दिव्य घटना: रामदेव का घोड़े पर चढ़ना

जब घोड़े तैयार होकर लाए जाते हैं, रामदेवजी उनपर चढ़ते हैं, और एड़ी लगाते ही घोड़े आकाश की ओर उड़ जाते हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि वह घोड़ा कोई साधारण घोड़ा नहीं था, बल्कि एक जादुई या चमत्कारी रचना थी।

यहाँ दर्शाया गया है कि रामदेवजी केवल राजा के पुत्र नहीं, बल्कि एक दिव्य अवतार हैं, जिनकी लीलाएँ साधारण मानव की समझ से परे हैं।

4. दर्जी की सजा और प्रायश्चित

घोड़े के उड़ने की घटना के बाद, माता-पिता और दरबार में सभी स्तब्ध हो जाते हैं। दर्जी को झूठ समझा जाता है और उसे कैद करवा दिया जाता है। लेकिन बाद में दर्जी स्वयं रामदेवजी से क्षमा याचना करता है और प्रार्थना करता है कि वह उसके कष्ट दूर करें।

यह प्रसंग बहुत भावुक है क्योंकि इसमें दिखाया गया है कि ईश्वर कभी भी अपने भक्त को दंड नहीं देते, जब वह सच्चे हृदय से क्षमा माँगता है। रामदेवजी उसकी विनती सुनते हैं और उसे मुक्त कर देते हैं।



5. रामदेवजी का अवतारी रूप और दर्जी का जागरण

दर्जी को स्वप्न या दिव्य दृष्टि में यह साक्षात्कार होता है कि रामदेवजी कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि ईश्वर का अवतार हैं।

वह समझ जाता है कि उसने जिन पर शक किया, वे तो साक्षात धरती पर अवतरित भगवान हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चे संत और अवतारों को पहचानना कठिन है, और उनके साथ किए गए व्यवहार का हमें ध्यान रखना चाहिए।

6. रुणिचे के धणी – जन-जन के आराध्य

भजन के अंत में "रुणिचे रा धणिया" कहकर रामदेवजी को रुणिचा गाँव के स्वामी के रूप में सम्मान दिया गया है। वे केवल एक परिवार या समाज के देवता नहीं, बल्कि जन-जन के आराध्य हैं जो हर कष्ट को हरने वाले हैं।

नैतिक और आध्यात्मिक संदेश

इस भजन में निहित कई गहरे संदेश हैं:

  • ईश्वर की लीला को समझना कठिन है, इसलिए शंका नहीं करनी चाहिए।

  • बाल लीलाओं में भी दिव्यता हो सकती है।

  • जो भक्त सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी गलती भी ईश्वर क्षमा करते हैं।

  • ईश्वर अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, परंतु अंततः उनके उद्धारक भी वही होते हैं।

निष्कर्ष

"मने घोड़लियों मंगवाय म्हारी मां" केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक कथा है जो रामदेवजी की चमत्कारी लीलाओं, उनकी करुणा, और दिव्यता को संगीतमय रूप में सामने लाती है। यह भजन राजस्थान और भारत के लोक जीवन में रामदेवजी की गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है।

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