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कीर्तन की है रात बाबा, आज ठाणे आणो है भजन लिरिक्स !! सांवलिया सेठ भजन लिरिक्स !!

 भजन : कीर्तन की है रात बाबा, आज ठाणे आणो है




दरबार सावरिया, ऐसो सजो प्यारा, दयालु आप को।
सेवा में सावरिया, सगला खड़ा डिगे, हुक्म बस आप को।।
सेवा में थारी, म्हणे आज बिछ जणो है,
थारे कोल निभाणो है…


कीर्तन की है तैयारी, कीर्तन करां जमकर, प्रभु क्यों देर करो?
वादों थारो दाता, कीर्तन में आणे को, घणी मत देर करो।।
भजनासूं ठाणे, म्हणे आज रिझाणो है,
थारे कोल निभाणो है…


जो कुछ बन्यो म्हासूं, अर्पण प्रभु सारो, प्रभु स्वीकार करो।
नादान सूं गलती, होती ही आई है, प्रभु मत ध्यान धरो।।
नंदू सावरिया, थानो दास पुराणो है,
थारे कोल निभाणो है…





भजन का विस्तृत भावार्थ / सारांश 

यह भजन एक अत्यंत भावुक एवं भक्तिभाव से परिपूर्ण रचना है, जिसमें एक सच्चा भक्त अपने आराध्य प्रभु श्रीकृष्ण से कीर्तन की रात पधारने की करुण पुकार कर रहा है। आइए इस भावार्थ को गहराई से समझते हैं।

1. कीर्तन की रात: भक्ति का विशेष अवसर

भजन का आरंभ इस पंक्ति से होता है:

यह पंक्ति स्वयं में बहुत कुछ कह जाती है। कीर्तन की रात एक ऐसा अवसर है जब भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। भजन, नृत्य, वादन, और भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम से भक्त अपने इष्टदेव के समीप पहुँचने की चेष्टा करता है। इस रात का महत्व केवल उत्सव का नहीं, आत्मा और परमात्मा के मिलन का है।

भक्त कहता है कि "आज तो प्रभु आपको आना ही होगा। यह कीर्तन की रात सामान्य नहीं है, यह मेरी आत्मा की पुकार है।" यह एक आग्रह नहीं, एक प्रेमपूर्ण आदेश है — जिसमें भक्त अपने प्रेम और समर्पण से प्रभु को वचन निभाने के लिए बुला रहा है।



2. दरबार की सजावट और प्रभु का स्वागत

"दरबार सावरिया, ऐसो सजो प्यारा, दयालु आप को…"

यहाँ भक्त प्रभु के स्वागत के लिए मन, मन्दिर और सभा को सजाकर तैयार कर चुका है। “दरबार” न केवल बाहरी सजावट का प्रतीक है, बल्कि भक्त के अंतःकरण की शुद्धि और समर्पण का संकेत भी है। यह भाव स्पष्ट करता है कि यदि हम प्रभु को पाना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर का दरबार सबसे पहले सजा कर पवित्र बनाना होगा।

भक्त की भावना है कि सब कुछ प्रभु के हाथ में है — "हुक्म बस आप को…", यानी सभा में सभी आपकी सेवा को तत्पर हैं, परंतु निर्णय तो आपके हाथ में है। यह समर्पण का सर्वोच्च भाव है — सेवा, श्रद्धा, प्रतीक्षा और धैर्य।

3. कीर्तन में आने का अनुरोध और आग्रह

"वादों थारो दाता, कीर्तन में आणे को, घणी मत देर करो…"

यहाँ भक्त बड़े ही मासूम भाव से कहता है — प्रभु! आपने वादा किया था कि जहाँ कीर्तन होगा, वहाँ आप साक्षात पधारेंगे। अब जब हमने कीर्तन की तैयारी कर ली है, तो कृपा कर विलंब न करें। इस भाव में भक्त का आत्मविश्वास और प्रेम दोनों झलकते हैं। वह कहता है कि हम भजन गाकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं — "भजनासूं ठाणे, म्हणे आज रिझाणो है…"

यह पंक्ति इंगित करती है कि भक्ति में केवल पवित्र भाव ही नहीं, बल्कि सरलता, प्रेम और निरंतर प्रार्थना का संगम भी आवश्यक है। प्रभु को बुलाने के लिए सच्चे स्वर और सच्चे भाव दोनों चाहिए।

4. पूर्ण समर्पण और आत्मग्लानि का मिश्रण

"जो कुछ बन्यो म्हासूं, अर्पण प्रभु सारो, प्रभु स्वीकार करो…"

यहाँ भक्त कहता है — हे प्रभु! मैं जो भी कर पाया, वह सब कुछ आपके चरणों में अर्पित करता हूँ। मेरी शक्ति सीमित है, मेरी श्रद्धा भी अधूरी है, परंतु मेरा प्रेम असीम है। मैं जो कुछ भी हूँ, वह आपका हूँ।

इसके साथ ही, वह अपनी गलतियों को भी स्वीकार करता है — "नादान सूं गलती, होती ही आई है…" — यानी प्रभु, मुझसे अक्सर गलतियाँ हुई हैं। मैं नादान हूँ, मूर्ख हूँ, परंतु मेरा प्रेम सच्चा है। यह आत्मग्लानि नहीं बल्कि आत्मबोध है। भक्त जानता है कि प्रभु की कृपा पाना सरल नहीं, परंतु सच्चा समर्पण ही रास्ता है।

5. पुराना सेवक, पुराना रिश्ता

"नंदू सावरिया, थानो दास पुराणो है…"

भक्त स्वयं को प्रभु का पुराना सेवक कहता है। यह केवल एक दावे की बात नहीं, बल्कि यह बताता है कि वह कई जन्मों से प्रभु की सेवा में लीन है। यह संबंध कोई नया नहीं, आत्मा और परमात्मा का शाश्वत संबंध है।

भक्त कहता है कि आज तो वह नाता निभाना है। जो वचन, जो प्रीत, जो रिश्ता आत्मा और परमात्मा के बीच है, उसे आज कीर्तन की इस रात में निभाया जाना है। "थारे कोल निभाणो है…" — यह पंक्ति केवल प्रभु के लिए नहीं, खुद के लिए भी एक संकल्प है।



निष्कर्ष (Essence in Short)

यह भजन एक आध्यात्मिक संवाद है — एक भक्त और भगवान के बीच। इसमें निम्न प्रमुख भाव निहित हैं:

  1. प्रभु को बुलाने की पुकार, जो प्रेम और श्रद्धा से परिपूर्ण है।

  2. पूर्ण समर्पण का भाव, जिसमें भक्त अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है।

  3. आत्मग्लानि और क्षमा याचना, जो एक नादान भक्त की सच्ची विनम्रता दर्शाती है।

  4. पुराने सेवक का रिश्ता, जो भक्त और प्रभु के बीच शाश्वत प्रेम का प्रतीक है।

  5. कीर्तन की रात का महत्व, जिसमें भक्ति, संगीत और प्रार्थना से ईश्वर को साक्षात अनुभव किया जा सकता है।

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