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पांच गाँव मारे पांडवों ने देवो भजन राजस्थानी लिरिक्स !! कृष्ण भजन लिरिक्स !! हिंदी भजन लिरिक्स !!

 

भजन: पांच गाँव मारे पांडवों ने देवो 


 पांच गाँव मारे पांडवों ने देवो 

पाँच गाँव मारे पांडवों ने देवो,
अरे बाकी राज तुम्हारा।
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा,
भारत रचीयो भलो नहीं होवे,
आया काल तुम्हारा,
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा।

काशी कसबेर और हस्तिनापुर,
दिल्ली शहर सतारा ए हा,
आबूगढ़ों रा देवु बेसना,
अरे बाकी राज तुम्हारा।
दुर्योधन केना मोन हमारा ए हा,
भारत रचीयो भलो नहीं होवे,
आया काल तुम्हारा,
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा।

भूमि नहीं देवु सुई भी नोक पर,
रणसिंह राम विचारा ए हा।
रणसिंह राम सुरों ने प्यारो,
चाहे जीतों ने हारो।
दुर्योधन केना मोन हमारा ए हा,
भारत रचीयो भलो नहीं होवे,
आया काल तुम्हारा,
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा।

क्यों थे आया, कौन बुलाया,
आप मोन घटाया ए हा।
राज तेज री खबर नहीं जानो,
गायो चरावणवाला।
दुर्योधन केना मोन हमारा ए हा,
भारत रचीयो भलो नहीं होवे,
आया काल तुम्हारा,
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा।

बोलो रे आंधली रा जाया,
बोले बोल कुवेला ए हा।
सूरदास बोले भरी सभा में,
आया काल तुम्हारा।
दुर्योधन केना मोन हमारा ए हा,
भारत रचीयो भलो नहीं होवे,
आया काल तुम्हारा,
दुर्योधन केना मान हमारा ए हा।



भावार्थ 

यह भजन महाभारत के उस निर्णायक क्षण को प्रस्तुत करता है जब पांडवों ने अपने अधिकारों के लिए अत्यंत विनम्रता और न्यूनतम मांग रखी थी – केवल पाँच गाँव। यह भजन कृष्ण के शांति-दूत के रूप में दुर्योधन के दरबार में जाने की कथा को स्वर देता है।

पहला भाग – शांति की प्रस्तावना:

"पाँच गाँव मारे पांडवों ने देवो..." – इस पंक्ति में पांडवों की उदारता झलकती है। उन्होंने अपना सारा साम्राज्य त्याग कर मात्र पाँच गाँव मांगे ताकि युद्ध न हो। यह दर्शाता है कि धर्म और न्याय की राह पर चलने वाले पांडव युद्ध नहीं चाहते थे।

लेकिन दुर्योधन का उत्तर – “भूमि नहीं देवु सुई की नोक पर” – उसकी अहंकारपूर्ण मानसिकता और अधर्म पर चलने की प्रवृत्ति को दिखाता है। भजन में यह पंक्ति बार-बार दोहराई जाती है: “भारत रचीयो भलो नहीं होवे” – यानी ऐसा भारत युद्ध से अच्छा नहीं बनेगा।

दूसरा भाग – नगरों की महिमा और सत्ता का लोभ:

काशी, कस्बे, हस्तिनापुर, दिल्ली, सतारा और आबूगढ़ जैसे प्रसिद्ध नगरों का उल्लेख, उस समय की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है। ये स्थान सत्ता के केंद्र थे, जिन्हें पाने की लालसा कौरवों को सत्य और धर्म से दूर कर रही थी।

पांडव कहते हैं – “आबूगढ़ों रा देवु बेसना” – यानि हम पहाड़ों में या उपेक्षित स्थानों में रह लेंगे, लेकिन अन्याय सहन नहीं करेंगे।

तीसरा भाग – रणभूमि और धर्मवीरता का भाव:

रणसिंह राम – यानी अर्जुन या कृष्ण की वीरता की प्रशंसा की गई है। वह चाहे युद्ध में जीतें या हारें, उनका मार्ग धर्म का है। कृष्ण की भूमिका यहाँ अत्यंत मार्मिक हो जाती है, जो खुद को केवल गाय चराने वाला बताते हैं लेकिन उनका तेज पूरे राज को डांवाडोल कर देता है।

चौथा भाग – कृष्ण का व्यंग्य और चेतावनी:

“क्यों थे आया, कौन बुलाया” – यह दुर्योधन का ताना है, लेकिन इसका उत्तर कृष्ण की निःस्वार्थ भूमिका से मिलता है। वह युद्ध रोकने आए थे, लेकिन दुर्योधन ने उनका अपमान किया।

भजन में एक अद्भुत दृश्यांकन है जब कृष्ण सभा में अपने विराट रूप का संकेत देते हैं – “राज तेज री खबर नी जानो” – यानी तुम उस तेज को नहीं पहचानते जो सामने खड़ा है।

पांचवां भाग – अंधे प्रेम में अंधा पुत्र:

“बोलो रे आंधली रा जाया” – यह गांधारी के पुत्र दुर्योधन के लिए व्यंग्य है। गांधारी ने आंखें ढक लीं, लेकिन दुर्योधन ने सत्य और न्याय पर भी पट्टी बांध ली थी।

“सूरदास बोले भरी सभा में” – यह संकेत है कि जो वास्तव में ‘नेत्रहीन’ हैं (जैसे सूरदास), वे भी सत्य पहचानते हैं, लेकिन जो अधिकार में हैं (दुर्योधन), वे अंधे बने रहते हैं।

निष्कर्ष:

इस भजन के माध्यम से रचनाकार ने यह संदेश दिया है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म का अंत निश्चित है। कृष्ण द्वारा शांति का प्रस्ताव अस्वीकार करना ही महाभारत युद्ध का कारण बना।

यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि धर्म-अधर्म, नीति-अनीति और सत्ता-त्याग के संघर्ष की एक रचनात्मक झलक है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब सत्य, न्याय और अहंकार के बीच टकराव होता है।

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