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थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे लिरिक्स !! निर्गुण भजन लिरिक्स !!

 

निर्गुण भजन: थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे





निर्गुण भजन: थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे


थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे।
थारी उमर बीती जाय, क्रोध ने तज रे।।


थारी उगमग चाले नाव, चोला ने लज रे।
तेरे सिर पर घूमे काल, अगाड़ी सज रे।।


थारे गोड़ा दियो जवाब, कमर गई लूल रे।
तेरी आख्यां सूं दिखे नाय, कान गया रूज रे।।


थारी परणी छोड़यो प्यार, कदर नहीं कर रे।
तेरा बेटा बोले बोल, मरेलो कद रे।।


कह गया दास कबीर, गुदड़ा लद रे।
थारो लेखो लेसी राम, मरेलो जद रे।।


थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे।
थारी उमर बीती जाय, क्रोध ने तज रे।।





भजन का विस्तृत भावार्थ 

यह निर्गुण भजन संत कबीर की परंपरा में गहरी आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत है, जो जीवन की नश्वरता, मोह-माया के बंधन, और ईश्वर-भक्ति की आवश्यकता पर बल देता है।

प्रथम छंद में शिक्षा:

"थारी मोह माया ने छोड़, राम ने भज रे।
थारी उमर बीती जाय, क्रोध ने तज रे।।"

इस छंद में भजनकार सीधे व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहते हैं — अब समय आ गया है कि तू मोह-माया का बंधन छोड़ दे और "राम" (अर्थात ईश्वर) का भजन कर। जीवन की उमर बीत रही है, और तू अभी भी क्रोध जैसे विनाशक दोषों में फंसा है। यह चेतावनी है कि जीवन बहुत अल्प है — क्रोध, लोभ, मोह जैसी बातों से बाहर निकल और प्रभु की शरण में आ।

द्वितीय छंद में शरीर की स्थिति और मृत्यु की निकटता:

"थारी उगमग चाले नाव, चोला ने लज रे।
तेरे सिर पर घूमे काल, अगाड़ी सज रे।।"

यहाँ शरीर को नाव बताया गया है, जो डगमगा रही है, यानी शरीर अब बूढ़ा हो चला है, स्थिर नहीं रहा। "चोला ने लज रे" — शरीर का चोला (तन) अब लज्जित हो रहा है, कमजोर हो गया है। "तेरे सिर पर घूमे काल" — मृत्यु सिर पर मंडरा रही है, और तू अब भी जागा नहीं! मृत्यु सामने खड़ी है, और फिर भी तू ईश्वर को नहीं पुकार रहा — यह चेतना का आह्वान है।

तृतीय छंद में वृद्धावस्था का वर्णन:

"थारे गोड़ा दियो जवाब, कमर गई लूल रे।
तेरी आख्यां सूं दिखे नाय, कान गया रूज रे।।"

शरीर की हालत का वर्णन बहुत सटीक और मार्मिक रूप से किया गया है। पैर जवाब दे चुके हैं, कमर झुक गई है, आँखें कमजोर हो गई हैं, और कानों से भी ठीक से सुनाई नहीं देता — यह सब जीवन के अंतिम चरण के संकेत हैं। जब इंद्रियाँ काम करना बंद कर रही हैं, तब संसार से मोह कैसा? अब तो केवल प्रभु स्मरण ही एकमात्र सहारा है।

चतुर्थ छंद में सामाजिक अस्वीकार्यता और अकेलापन:

"थारी परणी छोड़यो प्यार, कदर नहीं कर रे।
तेरा बेटा बोले बोल, मरेलो कद रे।।"

भजन में एक कटु सत्य को उजागर किया गया है — जब वृद्धावस्था आती है, तब अपने भी पराये हो जाते हैं। पत्नी, जो जीवन भर साथ रही, वह भी अब प्रेम नहीं करती। बेटा, जो उम्मीद का सहारा था, अब कटु वचन बोलता है। वह भी पूछता है, “ये मरा कब जाएगा?” — यह एक गहरी पीड़ा है, जो हमें सिखाती है कि मोह और रिश्ते स्थायी नहीं होते।

पंचम छंद में अंतिम वाणी और संत कबीर का उपदेश:

"कह गया दास कबीर, गुदड़ा लद रे।
थारो लेखो लेसी राम, मरेलो जद रे।।"

संत कबीर कहते हैं — जब तू इस संसार से विदा लेगा, तब तुझे कोई नहीं पूछेगा कि कितना धन था, कितनी संपत्ति थी। बस तेरे कर्मों का लेखा (लेख) ईश्वर लेगा। जो तू आज बो रहा है, वही मृत्यु के समय तेरे साथ जाएगा। इसलिए कबीर आग्रह करते हैं कि समय रहते चेत, और राम (ईश्वर) के नाम में मन लगा।

सारांश रूप में भावार्थ:

इस भजन का केंद्रीय भाव यही है कि —

  1. माया-मोह से बंधा मनुष्य जब तक जीता है, तब तक वह सच्चे आत्म-ज्ञान और ईश्वर-भक्ति से दूर रहता है।

  2. वृद्धावस्था आने पर न शरीर साथ देता है, न परिवार — तब सिर्फ ‘राम नाम’ ही एकमात्र सच्चा सहारा होता है।

  3. क्रोध, ममता, अहंकार, मोह — ये सब नष्ट हो जाएं, तभी आत्मा मुक्त हो सकती है।

  4. संत कबीर की वाणी हमें जगाने के लिए है — मृत्यु निश्चित है, अब भी समय है चेत जाने का।

अंतिम संदेश:

“जिन राम नाम न ऊर धरा, वे सब जीवन हारे।
जो जागे सो पार गए, बाकी माया मारे।”

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