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जरा हल्के गाड़ी हाँकियो भजन लिरिक्स !! निर्गुणी भजन लिरिक्स !! कबीरदासजी भजन लिरिक्स !! हिंदी भजन लिरिक्स !!

 




भजन: "जरा हल्के गाड़ी हाँकियो"

जरा हल्के गाड़ी हाँकियो
मेरे राम गाड़ी वाले।
जरा धीरे गाड़ी हाँकियो
मेरे राम गाड़ी वाले।।

1.

हाँकन वाली छैल छबीली,
बैंठन वाला राम।
गाड़ी अटकी रेत में,
मंजिल बड़ी है दूर।।
धर्मी अधर्मी पार उतर गया,
पापी चकना चूर।।

2.

देश-देश का वैद्य बुलाया,
लाया जड़ी और बूटी।
जड़ी-बूटी तेरे काम न आई,
जब राम के घर की छूटी।।

3.

चार जने मिल हाथ उठाया,
बांधी काठ की घोड़ी।
ले जाकर मरघट पर फूंकी,
फूंक दी नी जैसे होली।।

4.

बिलख-बिलख कर तिरिया रोवे,
बिछड़ गई मेरी जोड़ी।
कहे कबीर सुनो भई साधो,
जिन जोड़ी तिन तोड़ी।।


 


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भजन का भावार्थ 

इस भजन में कवि (संभवत: कबीर परंपरा के संत) आत्मा की अंतिम यात्रा को एक गाड़ी की यात्रा के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसमें 'राम' गाड़ी के सारथी हैं। यह गाड़ी जीवन से मृत्यु की ओर जा रही है। पूरा भजन एक गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश से भरपूर है।

मुख्य प्रतीकात्मक भाव:

  • गाड़ी: शरीर या जीवन की गाड़ी।

  • राम गाड़ी वाले: ईश्वर या नियंता जो आत्मा की दिशा तय करते हैं।

  • रेत में गाड़ी अटकना: सांसारिक मोह, माया और कर्मों की बाधाएं।

  • मंजिल दूर होना: मोक्ष की दूरी या आत्मा की मुक्ति की कठिन राह।

अर्थ विस्तार:

"जरा हल्के गाड़ी हाँकियो मेरे राम गाड़ी वाले"

भजन की शुरुआत विनम्र प्रार्थना से होती है — हे राम! मेरी जीवन की गाड़ी धीरे और सावधानी से चलाओ। यह एक गूढ़ निवेदन है कि जीवन के अंतिम क्षण, जब आत्मा शरीर से अलग होती है, वे शांत और सहज हों। मृत्यु के समय का यह भय और श्रद्धा से भरा भाव है।

हाँकन वाली छैल छबीली, बैंठन वाला राम"

यहाँ गाड़ी को एक सुंदर स्त्री के रूप में कल्पित किया गया है (छैल-छबीली)। और जो उसमें बैठा है, वह स्वयं प्रभु राम हैं। यह दृश्य बताता है कि यह जीवन एक आकर्षक भ्रम है, जिसमें स्वयं ईश्वर भी सहभागी हैं, लेकिन नियंत्रण उन्हीं के हाथ में है।

"गाड़ी अटकी रेत में, मंजिल बड़ी है दूर"

जब जीवन की गाड़ी संसार रूपी रेत में फँस जाती है, तो मोक्ष की मंजिल दूर प्रतीत होती है। यह रेत सांसारिक माया, लालच, वासनाएं हैं, जो आत्मा को रोकती हैं। यह पंक्ति आत्मचिंतन को उकसाती है कि हम कहाँ अटक रहे हैं।

"धर्मी अधर्मी पार उतर गया, पापी चकना चूर"

धर्मपूर्वक जीवन जीने वाला व्यक्ति पार चला गया — अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गया, जबकि पापी और अहंकारी चूर-चूर हो गया। यह कर्म सिद्धांत की पुष्टि है कि अंत में केवल कर्म साथ जाते हैं।

"देश-देश का वैद्य बुलाया..."

यहाँ मृत्यु के समय का चित्र है जब हर उपाय किया जाता है — वैद्य, डॉक्टर, दवाइयाँ, जड़ी-बूटियाँ — लेकिन कुछ काम नहीं आता, क्योंकि जब राम (ईश्वर) का बुलावा आता है, तो कोई चिकित्सा निःफल हो जाती है। यह मानवीय सीमाओं का संकेत है।

"चार जने मिल हाथ उठाया..."

मृत्यु के बाद, चार लोग शव को उठाकर श्मशान ले जाते हैं। ‘काठ की घोड़ी’ — अर्थ है अर्थी। शव को अग्नि दे दी जाती है — जैसे होली की लकड़ियाँ जलाई जाती हैं, वैसे ही यह शरीर भी जलता है। यह बताता है कि हमारा प्रिय शरीर अंततः राख हो जाता है।

"बिलख-बिलख कर तिरिया रोवे..."

पत्नी रो रही है, जोड़ी बिछड़ गई — यह पारिवारिक जीवन का गहरा दृश्य है। लेकिन यही सच्चाई है — जो साथ जन्मे, वे भी एक दिन अलग हो जाते हैं।

"कहे कबीर सुनो भई साधो, जिन जोड़ी तिन तोड़ी"

अंत में कबीर का कथन — जिन्होंने जोड़ी बनाई थी (ईश्वर), वही तोड़ते हैं। मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है। इसलिए विवेकपूर्ण जीवन जीना चाहिए और माया-मोह में न फँसकर आत्मा की सच्ची यात्रा को पहचानना चाहिए।

निष्कर्ष:

यह भजन मानव जीवन की नश्वरता, मोह, और मोक्ष की ओर ध्यान दिलाता है। हमें यह स्मरण कराता है कि:

  • जीवन क्षणिक है।

  • मृत्यु निश्चित है।

  • शरीर साथ नहीं जाता, सिर्फ कर्म जाते हैं।

  • परमात्मा की इच्छा ही अंतिम है।

साथ ही, यह भजन भले ही मृत्यु का वर्णन करता है, लेकिन इसका उद्देश्य डराना नहीं, जगाना है — ताकि हम चेतन होकर जीवन को सार्थक बनाएं।

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