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आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी bhajan lyrics !! ramdev ji bhajan lyrics !! Aajmal Ji Ra Kanvra Bhulu Na Ek Ghadi Bhajam lyrics !!

 


आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

बाज रहा है तंदूरा, बेब रे दरबार
खम्मा खम्मा गावे है, आ झंझर रे झंकार

आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी
महाराज काँवरा ने भूलूँ ना एक घड़ी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी 

थोड़ी-थोड़ी द्वाजा घनी रे, जातरियों री भीड़ घनी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी
महाराज काँवरा ने भूलूँ ना एक घड़ी

डोर देशारा बाबा आवे, तारे जातर दरगाह में
भीड़ घनी रे... भीड़ घनी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

अँधा भी आवे बाबा, पंगला भी आवे
दुखियारी भीड़ घनी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

लीले-लीले घोड़े ऊपर बैठा बाबो रामदेव
हाथा में सोने री छड़ी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

राम सरोवर ऊपर उबा बाबो रामदेव
पक्माई सोने री कड़ी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

हरी रे शरना में भाटी हर्जी बोले
रख जोमेद घनी
आजमल जी रा काँवरा भूलूँ ना एक घड़ी

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 भजन: "आजमल जी रा काँवरा भूलुं ना एक घड़ी" — विस्तृत सार

राजस्थानी लोकभक्ति की समृद्ध परंपरा में यह भजन “आजमल जी रा काँवरा भूलुं ना एक घड़ी” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक रचना है, जो बाबा रामदेव पीर जी की महिमा का गुणगान करती है। यह भजन लोकदेवता बाबा रामदेवजी और उनके सबसे प्रसिद्ध भक्त राजा आजमल के बीच हुई चमत्कारी भक्ति घटना पर आधारित है।

भजन का मुख्य भाव है कि राजा आजमल के काँवरे की भक्ति यात्रा इतनी पवित्र और चमत्कारी थी कि उसे एक पल के लिए भी भुलाया नहीं जा सकता। यह भजन लोकश्रद्धा, भक्ति, चमत्कार और बाबा रामदेवजी की सर्वधर्म समभाव वाली परंपरा को दर्शाता है।


भावार्थ: बाबा रामदेवजी और राजा आजमल की कथा की पृष्ठभूमि

राजा आजमल Multan (वर्तमान पाकिस्तान) के मुस्लिम शासक थे, जिनके पुत्र को कुष्ठ रोग (कोढ़) हो गया था। सारे वैद्य, हकीम, और उपायों के बाद भी जब उनका पुत्र ठीक नहीं हुआ, तब उन्हें बाबा रामदेव जी की चमत्कारी शक्ति की जानकारी मिली। राजा आजमल ने अपने बेटे को काँवर में बैठाकर स्वयं पैदल यात्रा शुरू की और बाबा रामदेव जी की रामदेवरा दरगाह (राजस्थान के पोखरण क्षेत्र में स्थित) पहुँचे। जैसे ही उन्होंने बाबा के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद मिला, उनके पुत्र का कोढ़ चमत्कारिक रूप से समाप्त हो गया।

इस अद्भुत अनुभव के बाद राजा आजमल ने न केवल बाबा की भक्ति स्वीकार की बल्कि रामदेवजी को "राम शाह पीर" के रूप में मुसलमानों और हिंदुओं दोनों के संत के रूप में मान्यता दी।



भजन का विवरणात्मक विश्लेषण

"आजमल जी रा काँवरा भूलुं ना एक घड़ी..."
भजनकार इस पंक्ति के माध्यम से कहता है कि वह आजमल जी की भक्ति यात्रा को, उस काँवरे को जिसने इतिहास में भक्ति का उदाहरण स्थापित किया, कभी नहीं भूल सकता।

"बाज रहा है तंदूरा बेब रे दरबार..."
यहाँ ‘तंदूरा’ (ढोल जैसा वाद्य यंत्र) की ध्वनि से संकेत मिलता है कि बाबा के दरबार में निरंतर भजन-कीर्तन, आस्था और भक्तों की उपस्थिति का उत्सव चलता रहता है। बाबा की दरगाह सिर्फ मंदिर नहीं, एक जीवंत भक्ति स्थल है।

"खम्मा-खम्मा गावे है आ झंझर रे झंकार..."
राजस्थानी संस्कृति में ‘खम्मा’ एक अभिवादन है। यहाँ बताया गया है कि भक्तगण झंझर बजाते हुए बाबा को प्रणाम कर रहे हैं, जैसे लोकनृत्य करते हुए, श्रद्धा से झूमते हुए बाबा की स्तुति हो रही हो।

"थोड़ी-थोड़ी द्वाजा घनी रे, जातरियों री भीड़ घनी..."
हर साल रामदेवरा में विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हैं। इस पंक्ति में उसी जातर का वर्णन है – भक्तजनों की भारी भीड़, लहराती हुई ध्वजाएं, और भक्ति का महासागर।

"डोर देशारा बाबा आवे, तारे जातर दरगाह में..."
यह पंक्ति बताती है कि बाबा अपने भक्तों को उनकी जातर (तीर्थ यात्रा) में दर्शन देते हैं। 'डोर देशारा' प्रतीक है बाबा की उपस्थिति और कृपा की अनुभूति का।

"अँधा भी आवे, पंगला भी आवे, दुखियारी भीड़ घनी..."
यह भजन का अत्यंत मार्मिक अंश है — यह दर्शाता है कि बाबा रामदेवजी की दरगाह हर किसी के लिए खुली है। कोई जात-पात नहीं, कोई भेदभाव नहीं। यहाँ अंधे भी आते हैं, लाचार भी आते हैं, और दुखियों की भी भीड़ होती है – सबको बाबा की शरण में शांति मिलती है।

"लीले-लीले घोड़े ऊपर बैठा बाबो रामदेव, हाथा में सोने री छड़ी..."
बाबा रामदेवजी का पारंपरिक चित्रण — नीले घोड़े पर सवार, हाथ में सोने की छड़ी लिए हुए — राजपूत वीरता और संतत्व का संगम है। यह छवि जनमानस में श्रद्धा की भावना को और प्रबल करती है।

"राम सरोवर ऊपर उबा बाबो रामदेव, पक्माई सोने री कड़ी..."
‘राम सरोवर’ बाबा रामदेव जी की समाधि स्थल के पास स्थित जलकुंड है, जहाँ श्रद्धालु स्नान करके बाबा के दर्शन करते हैं। ‘पक्माई सोने री कड़ी’ यानी बाबा की शक्ति अमूल्य है, जैसे सोने की बनी हुई हो – सुंदर और पवित्र।

"हरी रे शरना में भाटी हर्जी बोले, रख जोमेद घनी..."
यह पंक्ति बताती है कि बाबा के सच्चे भक्त, जैसे भाटी जाति के हर्जी जैसे लोग, बाबा से आशा और आस्था की बातें करते हैं। यह पंक्ति दर्शाती है कि बाबा हर उस भक्त की उम्मीद बनते हैं, जो सच्चे मन से शरण लेता है।


भजन का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश

यह भजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, सर्वधर्म समभाव और निष्कलंक भक्ति का भी संदेश देता है। बाबा रामदेवजी न केवल हिंदुओं द्वारा पूजे जाते हैं, बल्कि मुस्लिम समुदाय भी उन्हें पीर मानकर श्रद्धा से दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। यह भजन इस एकता का भी प्रतीक है।

भजन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति में कोई जाति, धर्म, अवस्था, या स्थिति मायने नहीं रखती। जो सच्चे हृदय से श्रद्धा करता है, बाबा उसकी पीड़ा हर लेते हैं।



 

निष्कर्ष

"आजमल जी रा काँवरा..." एक साधारण भजन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति, एक चमत्कारी श्रद्धा की गाथा, और लोक आस्था की धरोहर है। यह भजन हमें बाबा रामदेवजी की अद्भुत महिमा, उनकी लोकमान्यता और उनके द्वारा फैलाए गए प्रेम, समानता और भक्ति के संदेश की याद दिलाता है।

यह उन लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा है, जो सालों से रामदेवरा की जातर करते हैं, काँवरे उठाते हैं, और बाबा की दरगाह में सिर नवाकर लौटते हैं — नई ऊर्जा, आशा और कृपा के साथ।

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