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हनुमान दया करो मेरे भजन लिरिक्स !! मेरा कोई न साहरा हनुमान दया करो मेरे भजन लिरिक्स !! हनुमान भजन LYRICS !!

 हनुमान दया करो मेरे भजन लिरिक्स !! मेरा कोई न साहरा  हनुमान दया करो मेरे भजन लिरिक्स !! हनुमान भजन LYRICS !!


भजन : हनुमान दया करो मेरे 

मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे,

हनुमान दया करो मेरे ॥

तू माँ अंजनी का लाला है,
तू लाल लंगोटे वाला है,
सियाराम हृदय में तेरे,

तेरे दर्शन विभीषण पायो है,
लक्ष्मण के प्राण बचायो है,
करूं सुमिरन शाम सवेरे,

जो तुमसे प्रीत लगाते हैं,
आशा पूरी हो जाती है,
करो अवगुण दूर हमारे,

मैं बुद्धिहीन, अज्ञानी हूँ,
तुम महावीर, महाज्ञानी हो,
मेरी लाज अब हाथ तेरे,

तू महावीर बलशाली है,
भक्तों की करे रखवाली है,
अब शरण पड़ी मैं तेरे,

 मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे,

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 भजन का सार: “हनुमान दया करो मेरे”

यह भजन एक अत्यंत करुणामयी और भक्तिपरक रचना है जिसमें एक भक्त भगवान हनुमान जी के चरणों में अपनी पीड़ा, विवशता, और प्रेम भाव व्यक्त करता है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं बल्कि आत्मा की पुकार है — उस महावीर से जो संकटमोचन है, जो हर दुःख को हरते हैं, जो प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, और जो हर उस जीव के सहायक हैं जो उन्हें सच्चे हृदय से पुकारता है।


1. “मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

भजन की पहली पंक्ति ही इस भाव को प्रकट करती है कि यह भजन किसी साधारण भक्त द्वारा नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति द्वारा कहा गया है जिसे संसार में कोई सहारा नहीं दिखता। वह हर ओर निराशा, अंधकार, और पराजय का अनुभव कर रहा है। उस दशा में वह एकमात्र हनुमान जी को ही सहारा मानता है।

यह पंक्ति भक्त की पूर्ण समर्पण की भावना को दर्शाती है।
वह कहता है — “हे पवनसुत, संसार ने मुझे छोड़ दिया, अब तो केवल आप ही मेरी आशा हैं।”


2. “तू माँ अंजनी का लाला है, तू लाल लंगोटे वाला है, सियाराम हृदय में तेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

यहाँ भक्त हनुमान जी के स्वरूप और उनकी भक्ति का वर्णन करता है। वे माँ अंजनी के लाडले हैं, और उनका सरल वेश — लाल लंगोट — उनकी तपस्वी प्रकृति को दर्शाता है।

उनका हृदय केवल श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के प्रेम से परिपूर्ण है। वे किसी सांसारिक आकर्षण में नहीं फँसते। भक्त इस पंक्ति के माध्यम से कहता है कि जिस दिव्य रूप में राम बसे हों, वही कृपा करें।

"हे हनुमान! तुम स्वयं अपने हृदय में राम को बसाते हो, तो मुझमें भी उनकी भक्ति जगाओ।"


3. “तेरे दर्शन विभीषण पायो है, लक्ष्मण के प्राण बचायो है, करूं सुमिरन शाम सवेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

इस पद में हनुमान जी की प्रसिद्ध लीलाओं का उल्लेख है। विभीषण को लंका में आश्रय मिला क्योंकि उन्होंने हनुमान जी के दर्शन किए। और लक्ष्मण की मूर्छा के समय संजीवनी बूटी लाकर हनुमान जी ने उन्हें जीवनदान दिया।

भक्त कहता है कि वह भी सच्चे भाव से सुबह-शाम आपका सुमिरन करता है, इसलिए मेरी भी रक्षा करो, मुझे भी कष्टों से मुक्ति दो।


4. “जो तुमसे प्रीत लगाते हैं, आशा पूरी हो जाती है, करो अवगुण दूर हमारे, हनुमान दया करो मेरे।”

यहाँ भक्त विश्वास के साथ कहता है कि हनुमान जी अपने भक्तों की हर प्रार्थना सुनते हैं। जो भी उनसे प्रेम करता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

भक्त विनय करता है — “हे प्रभु, मुझसे जाने-अनजाने में जो भी पाप, दोष, अवगुण हुए हैं, कृपया उन्हें क्षमा करें। मुझे शुद्ध करें, मेरा मार्गदर्शन करें।”


5. “मैं बुद्धिहीन अज्ञानी हूँ, तुम महावीर महाज्ञानी हो, मेरी लाज हाथ अब तेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

इस पद में भक्त अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को स्वीकार करता है। वह कहता है कि मैं अज्ञानी हूँ, मेरी बुद्धि कुंठित है। मुझे क्या करना है, कैसे चलना है, इसका विवेक नहीं है।

और दूसरी ओर, आप महावीर हो, विद्वानों में श्रेष्ठ, ब्रह्मज्ञानी, नीति-कुशल।
भक्त अपनी लाज हनुमान जी के हाथों में सौंप देता है — “अब आप ही मेरी रक्षा करें।”


6. “तू महावीर बलशाली है, भक्तों की करे रखवाली है, अब शरण पड़ी मैं तेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

हनुमान जी का परिचय एक रक्षक के रूप में है। वे शक्ति, पराक्रम और निर्भयता के प्रतीक हैं। उनका बल अपार है, और वह केवल दुष्टों का नाश ही नहीं करते बल्कि सच्चे भक्तों की रक्षा करते हैं।

भक्त पूर्ण आत्मसमर्पण की अवस्था में पहुँच जाता है।
“अब मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, हे संकटमोचन! मुझे अपनी कृपा से मुक्त करें।”


7. पुनरावृत्ति: “मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे, हनुमान दया करो मेरे।”

यह अंतिम दोहराव इस बात को पुष्ट करता है कि इस भजन का केंद्र एक ही भाव है — “पूर्ण शरणागति”

यह उस आत्मा की पुकार है जो हर सांसारिक उपाय से थक चुकी है, और अब केवल हनुमान जी की दया की याचना कर रही है।


निष्कर्ष (उपसंहार):

यह भजन एक अत्यंत मार्मिक और सच्ची भक्ति से ओत-प्रोत निवेदन है। इसमें आत्म-समर्पण, पश्चाताप, करुणा की याचना, और प्रभु के गुणगान — ये चारों भाव हैं।

  1. इसमें भक्त अपने दोषों को स्वीकार करता है, और हनुमान जी से सुधार की अपेक्षा करता है

  2. वह हनुमान जी के महान कार्यों को याद करता है, ताकि स्वयं में भी विश्वास जगा सके।

  3. वह संपूर्ण हृदय से शरणागत होता है — यह भक्ति का सबसे उच्च रूप है।




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