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नियत तेरी अच्छी है तो घर ही मथुरा काशी है nirguni bhajan lyrics !! kabirdas bhajan lyrics !!

 

नियत तेरी अच्छी है तो घर ही मथुरा काशी है 


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नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है

कर्म तेरे अगर अच्छे हैं तो किस्मत तेरी दासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।

कर न सको यदि पुण्य कोई, तो कम से कम मत पाप करो,
दिल को चोट पहुँच न जाए, ऐसा कोई कलाप न करो।
ईर्ष्या-द्वेष नहीं करता जो, वह गृहस्थ सन्यासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।

झूठ कभी मत बोलो किसी से, हरदम सत्य की राह चलो,
बेईमानी से दूर रहो तुम, सच्चाई में विश्वास रखो।
ईश्वर अपनी पीड़ाओं से सत्गुण का अभिलाषी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।

लूट-खसोट मत करो हरगिज़, क्या तुम ले जाओगे?
गला काट कर इंसानों का, आखिर क्या पाओगे?
रोता है ‘सतिंदर अंजू’, जो लोभी और विलासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।

 (दोहराव)
कर्म तेरे अगर अच्छे हैं तो किस्मत तेरी दासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।

भक्ति भाव का संदेश:

यदि आपके कर्म और सोच शुद्ध हैं,
तो आपका घर ही मंदिर बन जाता है।
न मथुरा दूर है, न काशी —
सब कुछ भीतर ही समाया है।

भजन का विस्तृत भावार्थ

भूमिका:

यह भजन एक जीवन-दर्शन है जो मनुष्य के आचरण, नियत (इरादे), और उसके कर्मों की शुद्धता पर केंद्रित है। भजन का मुख्य संदेश यही है कि मनुष्य का अंतःकरण यदि पवित्र है, उसका जीवन यदि सच्चाई, करुणा और सेवा पर आधारित है — तो वह कहीं भी रहे, उसका घर ही मथुरा या काशी जैसा पावन स्थल बन जाता है। किसी भी मंदिर, तीर्थ या धर्मस्थल जाने से पहले, यदि हम अपने मन और कर्म को सुधार लें, तो वहीं से मोक्ष की राह शुरू हो जाती है।

1. कर्म और किस्मत का संबंध:

"कर्म तेरे अगर अच्छे हैं तो किस्मत तेरी दासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।"

इस पंक्ति में बताया गया है कि हमारी किस्मत, हमारे कर्मों की सेवा में रहती है। अगर हम मेहनत, ईमानदारी और प्रेम से जीवन जिएं, तो भाग्य खुद ब खुद हमारे पीछे चलता है। वहीं, अगर हमारी नियत (intention) साफ है — मतलब हम किसी का बुरा नहीं सोचते, छल-कपट से दूर रहते हैं — तो हमारा घर ही एक तीर्थ बन जाता है। मथुरा और काशी जैसी पवित्र जगहें भी उसके सामने छोटी लगने लगती हैं, क्योंकि जहां सत्कर्म और सद्भावना हो, वही असली तीर्थ है।


2. पुण्य न सही, कम से कम पाप न करो:

"कर न सको यदि पुण्य कोई, तो कम से कम मत पाप करो,
दिल को चोट पहुँच न जाए, ऐसा कोई कलाप न करो।"

हर व्यक्ति बड़े-बड़े पुण्य (दान, तपस्या, तीर्थ यात्रा) नहीं कर सकता। लेकिन इतना तो कर ही सकता है कि किसी को कष्ट न दे, किसी को अपमानित न करे, या किसी के दिल को न दुखाए।
इसका सरल संदेश है: अगर आप दुनिया के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते, तो कम से कम बुरा न करें। यही एक सामान्य इंसान का भी धर्म है।

3. ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त गृहस्थ ही सच्चा सन्यासी है:

"ईर्ष्या-द्वेष नहीं करता जो, वह गृहस्थ सन्यासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।"

आज के युग में हम सोचते हैं कि सन्यासी वही है जो घर छोड़ कर जंगल चला जाए या किसी मठ में तप करे। परंतु इस भजन में एक बड़ा गूढ़ ज्ञान छिपा है: जो व्यक्ति घर-परिवार में रहकर भी ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, लालच से दूर रहता है, वही असली सन्यासी है। उसे संसार से भागने की ज़रूरत नहीं है — वह अपने कर्तव्य निभाते हुए ही आत्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।

4. झूठ और बेईमानी से बचो:

"झूठ कभी मत बोलो किसी से, हरदम सत्य की राह चलो,
बेईमानी से दूर रहो तुम, हो कर बेपरवाह चलो।"

झूठ बोलना, किसी को धोखा देना, झूठी बातें बना कर स्वार्थ सिद्ध करना — यह सब पाप की श्रेणी में आता है। भजन यही सिखाता है कि सत्य को अपनाओ। चाहे सत्य कठिन हो, पर उसमें शांति और ईश्वर का वास होता है।
"बेपरवाह चलो" का अर्थ है – लोग क्या कहेंगे इसकी चिंता छोड़कर सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर डटे रहो।


5. ईश्वर कष्ट देकर भी तुम्हें गुणवान बनाता है:

"ईश्वर अपनी पीड़ाओं से सत्गुण का अभिलाषी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।"

यह पंक्ति बहुत गहरे अर्थ को समेटे है। जब हमें जीवन में तकलीफ़ें मिलती हैं, तो अक्सर हम भगवान को दोष देने लगते हैं। लेकिन यह भजन कहता है कि भगवान कभी अकारण पीड़ा नहीं देता। वह चाहता है कि तुम्हारे भीतर सतगुण (सच्चाई, सहनशीलता, करुणा) उत्पन्न हो — इसलिए तुम्हें परीक्षा देता है। जो इसे समझ जाता है, वही आत्मा आगे बढ़ती है।

6. लालच, हिंसा और पाप का अंत दुखद होता है:

"लूट-खसोट मत करो हरगिज़, क्या तुम ले जाओगे?
गला काट कर इंसानों का, आखिर क्या पाओगे?"

यहां यह स्पष्ट किया गया है कि धन, सत्ता, या भोग-विलास के लिए दूसरों को दुख देना, लूटना या मारना अंततः केवल पछतावे और दुःख ही देता है। यह सांसारिक वस्तुएं नश्वर हैं — अंत में तुम कुछ नहीं ले जा सकोगे। फिर इस अधर्म से क्या लाभ?

7. लोभ और विलास में फंसा व्यक्ति अंत में रोता है:

"रोता है ‘सतिंदर अंजू’, जो लोभी और विलासी है,
नियत तेरी अच्छी हो तो घर ही मथुरा-काशी है।"

कवि यहां स्वयं के अनुभव या दूसरों के उदाहरण के ज़रिए कहता है कि जो व्यक्ति लोभ और विलास में डूबा रहता है — अंत में खाली हाथ और पछतावा लेकर ही मरता है। केवल वही सुखी होता है जिसकी नियत साफzहोती है, जो संतोष में जीता है।

समग्र संदेश:

इस भजन का मूल सार यही है कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है — "नियत", यानी हमारे विचार और भावनाएं। अगर हमारी सोच साफ़ है, हमारी नीयत अच्छी है, और हम दूसरों के प्रति दयालु हैं — तो हमारा जीवन अपने आप एक आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है।

हमें मथुरा या काशी जाने की ज़रूरत नहीं, अगर हमारे कर्म, व्यवहार, और सोच पवित्र हो। हर घर मंदिर बन सकता है, यदि उसमें प्रेम, करुणा और सत्य हो।

नैतिक शिक्षा:

  • अच्छे कर्म ही किस्मत बनाते हैं।

  • दिल न दुखाना, यही सबसे बड़ा धर्म है।

  • सत्य की राह कठिन हो सकती है, पर वही सच्ची है।

  • जीवन की कठिनाइयाँ भी हमें ऊँचा बनाती हैं।

  • लोभ, हिंसा और झूठ हमें अंत में पछतावा ही देते हैं।

  • नियत पवित्र है तो हर घर मंदिर है।

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