कबीर के दोहे भजन से पहले गए जाने वाले कबीर के प्रसिद्ध दोहे एवं उनके अर्थ लिरिक्स !! भजन दोहे लिरिक्स!!
कबीर के प्रसिद्ध दोहे एवं उनके अर्थ
1."बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥"
अर्थ:
सिर्फ ऊँचाई (बड़ा पद या धन) होने से कोई महान नहीं होता। जैसे खजूर का पेड़ ऊँचा होता है, लेकिन न तो वह राहगीरों को छाया देता है और न ही उसके फल आसानी से मिलते हैं। सच्ची महानता तो वही है जो दूसरों के काम आए।
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2."चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥"
अर्थ:
इस संसार में हर कोई विपरीत परिस्थितियों के बीच पिसता रहता है, जैसे पिसाई के दौरान अनाज के दाने चक्की में पिस जाते हैं। इस संसार में कोई भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता, सबको संघर्षों का सामना करना पड़ता है।
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3."अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥"
अर्थ:
अत्यधिक बोलना और पूरी तरह चुप रहना, दोनों ही नुकसानदायक होते हैं। जैसे ज्यादा बारिश फसलों को नष्ट कर देती है और बहुत अधिक धूप भी नुकसान पहुँचाती है। जीवन में संतुलन जरूरी है।
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4."कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥"
अर्थ:
कबीर कहते हैं कि वे सबके भले की कामना करते हैं। न तो किसी से विशेष मित्रता रखते हैं, न किसी से शत्रुता। उन्हें सभी समान हैं, क्योंकि सच्चा संत सबका भला चाहता है।
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5."दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥"
अर्थ:
जब लोग दुःख में होते हैं, तो भगवान को याद करते हैं, लेकिन सुख में उनकी भक्ति भूल जाते हैं। अगर सुख में भी भगवान का ध्यान रखा जाए, तो दुःख आएगा ही नहीं।
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ये दोहे हमें जीवन में सादगी, सच्चा
ई, परोपकार, और संतुलन बनाए रखने की शिक्षा देते हैं।
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